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chhath puja 2018 Vrat Katha and Histroy in Hindi! छठ पर्व व्रत कथा एवं पूजा विधि

Chhath Puja Vrat Katha Puja Vidhi : भगवान सूर्यदेव के प्रति भक्तों के अटल आस्था का अनूठा पर्व छठ पर्व हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष के चतुर्थी से सप्तमी तिथि तक मनाया जाता है।

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छठ पर्व 2018 ( chhath puja date 2018 )

बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश सहित सम्पूर्ण भारतवर्ष में बेहद धूमधाम और हर्सोल्लास पूर्वक मनाया जाने वाला छठ पर्व साल 2018 में 11 नवंबर से 13 नवंबर तक मनाया जाएगा।

छठ व्रत (Chhath Puja Dates) की मुख्य तिथियां निम्न हैं

छठ व्रत हिन्दु पंचाग के अनुसार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष के चतुर्थी से सप्तमी तक मनाया जाता है. यह भगवान सूर्यदेव और षष्टी देवी को समर्पित एक विशेष पर्व है। यह पर्व मुख्यतः यूपी, झारखंड और बिहार में तो इसे महापर्व के रूप में बहुत धूमधाम और हर्सोल्लास पूर्वक मनाया जाता है। इस पर्व पर पुरूष व स्त्री दोनों मनाते हैं एवं इस व्रत में छठी माता (षष्टी माता) की पूजा होती है और उनसे पारिवारिक सुख-समृद्धि व संतान की रक्षा का वरदान मांगा जाता है।

शुद्धता, स्वच्छता और पवित्रता के साथ मनाया जाने वाला यह पर्व आदिकाल से मनाया जा रहा है। छठ पूजा में निर्जला रहकर उगते और डूबते सूर्य को उपासना की जाती है। कई स्थानों पर छठ पर्व बर्ष में दो बार मनाया जाता है। पहले चैत्र माह में और उसके बाद कार्तिक माह में –

छठ पूजा व्रत कथा | Chhath Puja Vrat Katha in Hindi

पौराणिक कथा के अनुसार प्रियव्रत नाम के एक राजा थे। उनकी पत्नी का नाम मालिनी था। परंतु दोनों की कोई संतान न होने के कारण दोनो बहुत दुःखी रहते थे।  उन्होंने एक दिन संतान प्राप्ति की इच्छा से महर्षि कश्यप द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया। इस यज्ञ के प्रभाव से रानी गर्भवती हो गई। लेकिन नौ महीने बाद संतान सुख को प्राप्त करने का समय आया तो रानी को मरा हुआ पुत्र प्राप्त हुआ। इस बात को सुनकर राजा को बहुत दुःख हुआ और संतान शोक में वह आत्म हत्या करने हेतु तत्पर हुए। परंतु जैसे ही राजा ने आत्महत्या करने की कोशिश की उनके सामने एक सुंदर देवी प्रकट हुईं।

देवी ने राजा को कहा कि “मैं षष्टी देवी हूं”। मैं लोगों को पुत्र का सौभाग्य प्रदान करती हूं। इसके अलावा जो सच्चे भाव से मेरी पूजा करता है मैं उसके सभी प्रकार के मनोरथ को पूर्ण कर देती हूं। यदि तुम मेरी पूजा करोगे तो मैं तुम्हें पुत्र रत्न प्रदान करूंगी।” देवी की बातों से प्रभावित होकर राजा ने उनकी आज्ञा का पालन किया।

राजा और उनकी पत्नी ने कार्तिक शुक्ल की षष्टी तिथि के दिन देवी षष्टी की पूरे विधि -विधान से पूजा की। इस पूजा के फलस्वरूप उन्हें एक सुंदर पुत्र की प्राप्ति हुई। तभी से छठ का पावन पर्व मनाया जाने लगा।

वर्ष 2018 में छठ पर्व 11 नवम्बर से शुरू होकर 13 नवम्बर तक मनाया जायेगा, जिसमें 11 नबम्बर को नहाय-खाय, 12 नबम्बर को- खरना, 13 नबम्बर को –डूबते सूर्य को अर्ध्य एवं 14 नबम्बर को उगते सूर्य को अर्ध्य पड़ेगा

छठ पूजा का महत्व | Importance of Chhath Puja

भगवान सूर्य वास्तव में एक मात्र प्रत्यक्ष देवता हैं। इनकी रोशनी से ही प्रकृति में जीवन चक्र चलता है। इनकी किरणों से ही धरती में प्राण का संचार होता है और फल, फूल, अनाज, अंड और शुक्र का निर्माण होता है। यही वर्षा का आकर्षण करते हैं और ऋतु चक्र को चलाते हैं।

सूर्य देवता की इस अपार कृपा के लिए श्रद्धा पूर्वक समर्पण और पूजा उनके प्रति कृतज्ञता को दर्शाता है। सूर्य षष्टी या छठ व्रत इन्हीं आदित्य सूर्य भगवान को समर्पित है।

इस महापर्व में सूर्य नारायण के साथ देवी षष्टी की पूजा भी होती है। इस पर्व के विषय में मान्यता यह है कि जो भी षष्टी माता और सूर्य देव से इस दिन मांगा जाता है वह मुराद अवश्य पूरी होती है.

छठ पूजा व्रत विधि | Chhat Puja Vrat Vidhi 

भगवान सूर्य देव और देवी षष्टी माता को समर्पित यह त्यौहार पूरी सादगी, स्वच्छता और समर्पण से मनाया जाता है। इस व्रत को स्त्री और पुरुष दोनों ही सामान रूप से रखते है। छठ व्रत चार दिनों तक चलता है।

खाए नहाय:  इस व्रत के पहले दिन यानी की कार्तिक शुक्ल चतुर्थी में व्रती आत्म शुद्धि हेतु केवल अरवा (शुद्ध आहार) खाते है।

लोहंडा और खरनाः कार्तिक शुक्ल पंचमी के दिन उपासक स्नान करके पूजा पाठ करके संध्या काल में गुड़ और नये चावल से खीर बनाकर फल और मिष्टान से छठी माता की पूजा की जाती है फिर व्रत करने वाले कुमारी कन्याओं को एवं ब्रह्मणों को भोजन करवाकर इसी खीर को प्रसाद के तौर पर खाते हैं।

शाम का अर्घ्य: कार्तिक शुक्ल षष्टी के दिन घर में पवित्रता एवं शुद्धता के साथ उत्तम पकवान बनाये जाते हैं। संध्या के समय पकवानों को बड़े बडे बांस के डालों में भरकर जलाशय के निकट यानी नदी, तालाब, सरोवर पर ले जाया जाता है। इन जलाशयों में ईख का घर बनाकर उनपर दीया जालाया जाता है।

व्रत करने वाले जल में स्नान कर इन डालों को उठाकर डूबते सूर्य एवं षष्टी माता को आर्घ्य देते हैं। सूर्यास्त के पश्चात लोग अपने अपने घर वापस आ जाते हैं। रात भर जागरण किया जाता है।

सुबह का अर्घ्य: कार्तिक शुक्ल सप्तमी के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में पुन: संध्या काल की तरह डालों में पकवान, नारियल, केला, मिठाई भर कर नदी तट पर लोग जमा होते हैं। व्रत करने वाले (व्रती) सुबह के समय उगते सूर्य को आर्घ्य देते हैं। अंकुरित चना हाथ में लेकर षष्ठी व्रत की कथा कही और सुनी जाती है। कथा के बाद प्रसाद वितरण किया जाता है और फिर सभी अपने अपने घर लौट आते हैं। व्रती इस दिन पारण करते हैं।

छठ पूजा के नियम-

छठ पूजा करने वाले व्रती को कई कड़े नियमों का पालन करना पड़ता है लेकिन बदलते परिवेश में इन नियमों भी बदलाव होते रहेत है। आइये जानते हैं छठ पर्व से सम्बन्धित नियमों को –

  • छठ व्रत में साफ-सुथरे व नए व बिना सिलाई के कपडे पहने जाते है। महिलायें साडी और पुरुष धोती पहन सकते है।
  • इस चार दिनों में व्रत करने वाला व्रत धरती पे सोता है। जिसके लिए कम्बल और चटाई का प्रयोग कर सकता है।
  • इन दिनों घर में प्याज. लहसुन और मांस का प्रयोग वर्जित होता है।
  • छठ पूजा के बीच में या यह पर्व आने वाला हो तव किसी करीबी या रिश्तेदार का अवसान हो जाये तो उस वर्ष इस व्रत को नही रखना चाहिए।
  • इस पवित्र पर्व पर क्रोध, मोह, लोभ और काम को त्यागकर सुगम व सात्विक आचरण करना चाहिए।

छठ व्रत के अन्य नाम-

  • डाला छठ
  • सूर्य सस्थी
  • छठी माई की पूजा
  • डाला पूजा छठ पर्व

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